A storehouse of memories: Munsiyari ke Master ji

The splendid natural beauty of a place often overwhelms its history; the pristine glory of distant habitations circumscribed by the bounties of nature as if born anew spins a romantic yarn that belies its age and contradictions. The end of the road is more than often the beginning of new imaginaries of life and living and as Munsiyari will recall, new enough for you but old enough for its land and people to become legends unto themselves.

Translating into ‘a snow laden place’, Munsiyari is snuggled close to the Panchachuli peaks of the Western Himalayan range in Pitthoragarh district of Uttarakhand. Memories of Munsiyari, for most, are laden with an immediate association with inaccessibility. Far into the eastern limit of Uttarakhand, well beyond Kali Kumaon and into the territory of Johar, distance is not only an element to its identity, it is an experience. And it certainly is treacherous too. Running along the length of the Gori River while travelling on well laid out roads, this distance now seems surmountable even though seasonally, especially when it rains and snows, bits of the stretch of the road give away.

Nestled at the near end of the town, is the Tribal Heritage Museum. Housed in an old building with a sizeable newly built extension, the sight of the museum inspires bewilderment. Usually associated with state sponsored projects of conservation designed mostly by protocol, one wonders why here, far out in Munsiyari? It is only when one knows that this is also known as Master ji’s museum that one expects another layer to the story.

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Dr. Sher Singh Pangtey, the fondly known Master ji, glides from room to room in this museum with a smile on his face and warmth in his conduct. ‘I charge ten rupees from each visitor to cover the costs of a caretaker, but sometimes visitors are not ready to pay that small an amount either’, he says, not with a sense of complaint but with one of curiosity. Inviting us to look at the displays, he lingers unassumingly, telling us that if we needed to ask him anything, he would be happy to answer. It takes a while for one to understand that it is Dr. Pangtey whose brainchild this collection and display it is, something that he has been involved with for nearly thirty years now.

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‘I used to teach history in the Government Inter College in Munsiyari and retired in 1995, that’s when my real work began’, he says in his trademark grin, ‘and did my PhD as a 52 year old student. The museum as you see it now took shape in 2008 with part funding from the state government of Uttarakhand’. The various awards and honours he has received from universities, the government and from cultural organizations are hard to miss. But what is definitely hard to miss is the detail and thought that has gone into organizing the objects on display – right from medicinal herbs and ornaments to tea making vessels and musical instruments – the items are lined up immaculately with precise descriptions.

One of the items that struck my eye was a deed of a civil suit on the matter of trading (arati) rights between an Indian Trade Agent and the Tibetan villages of Sarpa, Thokpa, Jangba Trokpa and Pamar Chhusarba dating the 19th century. Himself the son of a Tibetan trader with a doctorate on the Shauka tribes of the Johar region, Dr. Pangtey is certainly most well poised to take on the task of retrieving fragments of what was once a living reality at the borders of Uttarakhand, the Indo-Tibet trade which came to a halt since the Indo-China war of 1962, the same year that the district of Pitthoragarh in which Munsiyari is now located, was created.

‘Most of the items on display were gathered from within the area, from among the residents, most of these had been discarded or were on the verge of being thrown away’, Dr. Pangtey informed. In his inimitable style, he explained to us how a variety of salted tea was made in the area in a vessel designed for just that purpose, showed us a still functional wooden sewing machine, made us feel a specimen of the yartsa gunbu – the winter worm and summer grass in Tibetan – a medicinal caterpillar fungus, read excerpts from a book written by him, told us about the trekking route to Milam – the last village on the Indo-Tibet border and gave to us a DVD about the melas (fairs) of the region that he had helped produce. Sat in a museum built by an individual in his own capacity over the years, we were mesmerized by what a visit to the Master ji in Munsiyari beheld for us.

Perhaps that the thing about engaging with what we call history, what we usually like to see from the outside as observers and not as those who also live it continually. In Dr. Pangtey’s efforts is an attempt to not conserve or preserve, but to engage with the dynamism of the past that continues to be integral to our present and not before or beyond it. Histories are experiential, but they are also local and material, which are often part of our daily lives and lived realities. Dr. Pangtey has best recognized this and through his efforts, we have an opportunity to witness it too.





डर के आगे जीत है, और पीछे?


चुनावी राजनीति वह बला है जो नवरस की तरह लगभग सारी भावनाओं और मुद्राओं के सहयोग से अवतरित हो पाती है I चुनाव से पहले के माहौल की गहमा-गहमी की ऊर्जा ही कुछ ऐसी होती है कि हर घर -चौबारे चौपाल बन जाए I टी.वी और इन्टरनेट के युग में हर टीवी और लैपटॉप स्क्रीन ही अदालत हो गई है – विचारों की,मतेभेदों की, सवालों की I कुछ ऐसी भावनाओं का एहसास हो जाता है जिनका कोई ज्ञान न हो और जिन्हें नाम देना भी मुश्किल हो जाए – झुंझलाहट से आगे वाली थकावट, क्रोध से दाँत भीजते भीजते जबड़े का दर्द या फिर निराशा वाली मुस्कान से भरी चुटकुलाहट – दिल और दिमाग की ऐसी एक्सरसाइज कि पसीना और ठण्ड साथ साथ आ पड़े I 

अमरीकी आबो -हवा में यही नवरस घुल घुल कर बह रहा है I टीवी सीरियल नुमा न्यूज़ और फिल्मनुमा प्रेसिडेंशियल डिबेट के आगे पीछे कोई और बात करने की जैसे गुंजाइश ही नहीं रही I लांछन और काउंटर-लांछन के चक्रव्यूह में सच का वज़न अब खतरनाक के पैमाने से तय होने लगा है I जिस चिल्लम चिल्ली के बीच कोई भी बात सुनाई पड़ पा रही है, उस से यही तय हो पा रहा है कि चुनाव दो उम्मीदवारों और उनके दावों पर नहीं, उनकी खतरनाक-ता के बल पर तय होगा, जो जितना कम खतरनाक, उतना ही वोट के लायक I हिलरी क्लिंटन और डॉनल्ड ट्रम्प के बीच का मुक़ाबला उनके लायक-नालायक होने के बल पर नहीं, कौन कितना कम डरावना है, इस बल पर तय होगा I 


यही बात है जो चुनाव के एक महीने पहले तक यह नहीं तय कर पा रही है कि डर भाँपे तो कैसे ? ये तो साफ़ है की पहली और दूसरी प्रेसिडेंशियल डिबेट के बीच ट्रम्प के बारे में टेप पर जो खुलासे हुए कि कैसे विगत वर्षों में ट्रम्प ने औरतों को  molest किया है, उसने कई के डर को एक नाम दे दिया – ट्रम्प का नाम, उसकी बेशर्मी का नाम और उसकी हीनता का नाम I टेप के द्वारा खुलासे के बाद तो खुलासों की कतार सी लग गई I जब ट्रम्प ने दूसरी डिबेट के दौरान इन दावों को नकार डाला तो एक दिन के अंदर ही अंदर आठ महिलाओं ने ट्रम्प द्वारा उनके साथ की गयी हिंसा का ब्यौरा टीवी पर दे डाला – ट्रम्प को झूठा साबित करने के लिए I भले ही ट्रम्प समर्थकों ने टी वी पर आकर और ट्रम्प ने ट्वीट कर कर इन दावों को झूठा, मनगढंत और राजनैतिक साज़िश का हिस्सा करार करने का भरसख प्रयास किया हो, इतना तो तय हो गया है कि बेशर्मी और खतरनाक के बीच अगर कोई लकीर है, तो ट्रम्प ने वो मिटा डाली है I 

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अजब फूल की गज़ब कहानी – II 

मुक्तेश्वर की वादियों में इस  torch lily को निहार निहार कर भी मेरा मन नहीं भरा I इसे लालच कहते हैं I और एक लालची इंसान की भाँति ये फूल मुक्तेश्वर से लखनऊ पहुँच गया , हमारे सफर का साथी बन I अगर मैडागास्कर जैसे ‘ट्रॉपिकल’ मौसम में ये फूल उग सकता था, तो भला लखनऊ में क्यों नहीं? मुक्तेश्वर से भीमताल की वापसी के दौरान हम मोतियापाथर घूमते हुए आ रहे थे, और रास्ते के एक गॉंव से पहाड़ी आलू खरीदने के लिए रुके हुए I यह फूल फिर दीख पड़ा और मुझसे रहा नहीं गया I तोड़ने का मन मार ही नहीं पाई I तभी पहाड़ी के ऊपर होते हुए construction से आवाज़ आई -‘इसे मत तोडना’ I अफसोसजनक बात यह थी कि मैंने टहनी तब तक थोड़ी मड़ोड़ ही ली थी I अपनी गलती के लिए क्षमा मांग पाती, उस से पहले ही फिर आवाज़ आई , ‘मैं ऊपर से ला कर देता हूँ’, और थोड़ी ही देर में मेरे हाथ में torch lily का पूरा पौधा ही आ गया था, जड़ समेत I और जड़ समेत ही वह लखनऊ भी पहुँच गया I

कई इंतेज़ाम किये गए और लखनऊ की कॉन्क्रीट बगिया में इसे भी एक गमला मिल गया I संतुलित पानी और तेज़ धूप से बचाव की हिदायत मैंने इन्टरनेट से खोज कर पा ली थी I और यही हिदायत घर में सबको बाँट दी गयी I दो हफ़्ते में जब इसने जड़ पकड़ ली तो मैं ख़ुशी से फूली नहीं समायी , ‘ये देखो , अफ्रीका का फूल हिमालय होते हुए अवध भी पहुँच गया और जम भी गया’, मैंने शाम की चाय के समय माँ – बब्बा को गर्व से बताया I अमरीका के लिए प्रस्थान करने से तीन दिन पहले फिर निहारा , नयी पत्तियां आनी भी शुरू हो गई थीं  पर फूल अभी भी नहीं था I ‘अभी तो फूल खिलने का मौसम ही नहीं है’, मैंने खुद को समझाया और मुड़ कर चली गयी I

परसों बब्बा का व्हाटसअप आया, घर की बागबानी पर अपडेट – गैंडे के फूल, गुड़हल के फूल, छोटे छोटे पैंसी भी I पर एक फूल समझ नहीं आया, आकार में गुड़हल जैसा पर रंग बहुत ही अनोखे I फिर दिमाग ठनका – ये तो उसी गमले की जगह की फोटो है जहां torch lily वाला गमला भी रखा था I विश्वास तो नहीं, संदेह ही हुआ – माँ ने यकीन दिलाया की यही है  torch lily का फूल, पर लखनऊ स्टाइल I


खुद ही देख लीजिये – मुझे तो अभी भी विश्वास नहीं हो रहा है I घर के हवा पानी से दूर इंसान ही नहीं, फूल भी बदल जाता है I पर अफ्रीका, हिमालय और अवध के बीच  इस फूल का घर हैं कहाँ?

सपने का मैटर

दूर बैठे लोगों के लिए अमरीका चकाचौंध से भरा हुआ है I टाइम्स स्क्वैर की जगमग रात से सना हुआ है I लॉस एंजेलेस की कित्रिमता के उजाले से सजा हुआ है I मायामी के तट के रंगों से घिरा हुआ है I एक टेक्निकलर सपने की तरह जिसकी हर रील में बड़ी लंबी सडकें और फर्राटे से भागती हुई गाड़ियां लोगों को अमरीका की महानता और विजय का स्वरुप नज़र आती हैं I जहां शहर से बड़े शॉपिंग मॉल और उससे भी बड़े आधुनिक पार्क अमरीका की समृद्धि का प्रतीक नज़र आते हैं I जहां आधुनिकता का वो पड़ाव है जिसके परे आधुनिकता ही नहीं रही जाएगी – एक ऐसी चकाचौंध जो वाकई में चौंधिया दे I


दूर से देखो और वो भी चकाचौंध के साथ, तो कई परतें नहीं दिखाई पड़ती I वैसे हो जैसे रेगिस्तान में ‘मिराज’, या मृगतृष्णा I ‘द अमेरिकन ड्रीम’ भी इसी चकाचौंध की उपज है – एक ऐसी मृगतृष्णा जिस के पीछे कई लोग कई समय से, कई पुश्तों से भागे जा रहें हैं I हर बार मिराज ही हाथ आता है I अमरीकी सम्पन्नता और आधुनिकता दूर से ही कायल कर देती है , दूर से ही ऐसा सपना दे डालती है कि लगता है कि पहुंचते ही पूरा हो जाएगा I सदियों से लोग इस दुनिया के तटों पर पहुँच रहें हैं, इस ‘ड्रीम’ के पीछे पीछे I और इस सपने की चकाचौंध में अक्सर ही बल्कि हमेशा ही उस भयावह सच का अहसास भी नहीं हो पाता जिसकी बुनियाद पर इन सपनों की कतार खड़ी हुई है I घर से बडे लॉन वाला सपना और उस से बडे गैरेज में दो बड़ी गाड़ियों वाला सपना या तो सपने के पीछे वाले सच को दफ़्न कर देता है, या लॉन के छोर पर इतनी बड़ी फेन्स खड़ी कर देता है कि  सपने का सच डिस्टर्ब ही न कर पाए I

ये सपने आखिर कर देखता कौन है? कुछ ऐसा मिज़ाज़ है इन सपनों का कि कुछ लोगों को आ ही नहीं सकते – ‘ड्रीम’ ‘अमेरिकन’ तो है पर भला ‘अमेरिकन’ कौन है ? क्या ‘अमेरिकन’ होना किसी शुद्धिकरण की प्रक्रिया स्वरुप है ? ये करना छोड़ दो और कुछ और करना शुरू कर दो , ‘डांस’ नहीं ‘डैंस’ बोलो या अपनी गाड़ी में पेट्रोल खुद ही डालो ? कुछ हरकतें ज़्यादा अमरीकी हैं तो कुछ कम पर कुछ ऐसी भी हैं जो आपको ‘अमेरिकन ड्रीम’ की दौड़ती हुई रील के उस कोने पर ला कर खड़ा कर देंगी जहां से आप या तो रील में गटक लिए जायेंगे या फिर अमरीका भर दौड़ते रह जाएंगे I

दूर वाली चकाचौंध में ये गटके हुए, आधे गिरते-संभलते हुए या फिर दौड़ते हुए लोग नहीं दिखाई पड़ेंगे I और भला क्यों? जब अमरीका स्वयं ही रील को ऐसे दौड़ा रहा है कि वो लोग यहाँ ही नज़र से दूर या गायब हो जाएँ तो अमेरिकन ड्रीम में उनका घुस पाना मुश्किल है I ‘नेटिव अमेरिकन’ ‘नेटिव’ हो सकते हैं, पर शायद ‘अमेरिकन’ नहीं I चकाचौंध सपने देखने वाले लोग स्वाभाविक रूप से पूछेंगे – भला ये नेटिव अमेरिकन हैं कौन? क्या सारे अमरीकी अमरीका में रहने से डिफॉल्ट ही नेटिव नहीं हो जाते ? यही है इस चकाचौंध की चमक का असर – ऐतिहासिक समझ और सूझ बूझ की ऐसी धज्जियां उड़ाना कि औरों की क्या, खुद की समझ भी दूसरों की समझ से तय होने लगती है I जिस अमरीका के लॉन, गाड़ी, घर, मॉल और पार्क का सपना हम और आप देखते हैं वो पिछले लगभग ५०० वर्षों में इन्हीं नेटिव अमेरिकन के घर, ज़मीन और धरोहर का अपहरण कर के खड़े हुए हैं I एक ऐसी लड़ाई जो अमेरिकन ड्रीम के वीडियो गेम्स में तो कत्तई नहीं उतारी जा सकती पर आज भी कई लोगों के जीवन का हिस्सा बनी हुई है I और इस कब्ज़े पर खड़े हुए देश की समृद्धि की कहानी भी अमेरिकन ड्रीम से उतनी ही दूर रहती है जितनी मेरी नाक से मेरी कोहनी -जिसे मैं देख सकती हूँ पर जो चाह के भी मेरी कोहनी को छू नहीं पायेगी I अफ्रीकियों की गुलामी की कहानी I ऐसी कहानी जो रूप -बेरूप अभी खत्म नहीं हुई है I

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षडयंत्र का सम्मान, महिलाओं का नहीं

उत्तर प्रदेश की चुनावी राजनीति हर बार देश के लिए एक तमाशा बन जाती है, कभी राजनैतिक दाँवपेंचों का तो कभी अप्रत्यशित सांठ गाँठ का I और ज़्यादातर कुछ ऐसे किस्सों का जिसके साखी केवल शर्म और ग्लानि के साथ याद आते हैं I २०१४ के लोक सभा चुनावों से जिस चुनावी गणित का बहिखाता खुला है, वो २०१७ के आगामी विधान सभा चुनाव तक चलते चलते केवल क़र्ज़ ही दर्ज़ कर पायेगा, शिष्टता और गरिमा का I

कई साल की गुमनामी के बाद भाजपा ने २०१४ के लोक सभा चुनाव से उत्तर प्रदेश में जो वापसी करी, वो इस गणित की साक्षी है I ये गणित जटिल होते हुए भी काफी सरल है I स्थानीय बाहुबली को बाकी गुटों से श्रेष्ठ ठहरा और जनतांत्रिक नीतियों के फल से वंचित बता, एक षड़यंत्र जैसी भावना को हवा देकर खुद को सशक्त करना I यह भावना एक सम्मोहन है जो काफी आसानी से तथाकथित उच्च, अग्रणी और बाहुबली (चाहे अग्रणी चाहे पिछड़ी) जातियों को एकमत करने में सफल साबित होती जा रही है I गज़ब बात यह है कि इसे हवा देने की लिए कोई राष्ट्रीय या अति व्यापक तंत्र नहीं चाहिए I व्हट्सऐप से लेकर स्थानीय अख़बारों में, मोहल्ले के कोने में लगे लाउडस्पीकर से लेकर चाय की बैठकों में इस तथाकथित षड़यंत्र का सम्मोहन ठोस हुआ जाता हैI   अगर हर चुनावी बिसात एक षड़यंत्र है, तो यह उस षड़यंत्र के प्रति एक षड़यंत्र है I

पर यह षड़यंत्र किस धागे से बुना जाता है ? कई समय तक पहले जनसँख्या में वृद्धि और फिर आरक्षण के मुद्दे को ले कर चुनावी राजनीति में अग्रणी जातियों के प्रति षड़यंत्र की कवायद ने अपना स्थान ग्रहण किया I भारत की आबादी में मुसलमानों की बढ़ती आबादी को लेकर चिंता और उस चिंता को देश की गैर-मुसलमान आबादी के प्रति मुसलमानों की साज़िश करार कर बहुतों ने अपनी चुनावी भाषण सेके I नब्बे के दशक में कुछ ऐसा ही ज़ोर आरक्षण की नीति के आढ़े पनपा I आरक्षण को अग्रणी जातियों के प्रति षड़यंत्र और उनके सामाजिक एवं आर्थिक पतन का कारण ठहराया जाने लगा I इन दोनों मुद्दों में ज़ोर अभी भी उतना ही है, पर पिछले तीन सालों में इतिहास के पन्नों से एक और षड़यंत्र की धारणा पुनर्जीवित हो गई है – हिन्दु समाज की महिलाओं के प्रति मुसलमान समाज के पुरुषों का तथाकथित ‘लव जिहाद’ I जब कुछ न काम करे तो पूरे प्रदेश की राजनीति को महिलाओं की इज़्ज़त और तथाकथित षड़यंत्र के दबाव में लिए गए फैसले पर झोंक दो और तमाशा देखो I बहुत सोचने पर याद आया कि पिछली बार इस तीव्रता से जब लव-जिहादनुमा भावनाओं नें समाज को झुलसाया था, वो भारत के विभाजन का दौर था I महिलाओं के सम्मान के आढ़े राजनीति नई कत्तई नहीं है, पर इतनी खतरनाक भी बहुत समय से नहीं रही थी I


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डाडा का वादा

कई बार ऐसा होता है कि  मेहमानों के बहाने ही अपने ही शहर में घूमना हो पाता है I नहीं तो रोज़मर्रा की मैय्यत में नज़र घड़ी और कदमों के ऊपर उठ नहीं पाती , आस पास का जायज़ा लेना भी दुर्लभ हो जाता है I पिछले वीकेण्ड मेरे ठिकाने मेरी मामी पहुँच गई और उनके बहाने छुट्टी का आलस और काम निपटाने की तैयारी छोड़ एक दिन के लिए अपने शहर में मैं मुसाफिर हो चली I धूप वाला चश्मा लगा के I
न्यू हेवन छोटा शहर है और मामी जी दिल्ली से आईं थी I इसलिए शहर को क़दमों में नापने में उन्हे अलग ही मज़ा आ रहा था I हर मोड़ पर मैं उन्हें कुछ दिखाती और बताती, वो बड़े ध्यान से सुनती और कभी कभार 'पर ये बताओ' टाइप का सवाल भी पूछ लेतीं I जितना मुझे पता था, उतना तो मैं भी कॉन्फिडेंस से बताती पर आबादी कितनी है, ये बिल्डिंग कितनी पुरानी है, इस से पहले यहां क्या था, इसका नाम ये क्यों पड़ा , इस टाइप वाले सवालों को मैं राउंड-ऑफ कर जाती, जैसे कि बिल चुकता करते समय दुकानदार करते हैं I चूंकि न्यू हेवन एक यूनिवर्सिटी टाउन है - यानि एक ऐसा शहर जहां यूनिवर्सिटी ही सबसे बड़ी हस्ती है, यूनिवर्सिटी से जुड़े कई देखने दिखाने लायक नमूने हैं I और इन्हीं में से एक है येल यूनिवर्सिटी की आर्ट गैलरी I 

'आर्ट' के नाम पर लोग ज़्यादातर दो टाइप की प्रतिक्रियाओं में सिमट जाते हैं - या तो वो जो मुंह बनाकर यह कहते हैं कि ये सब तो मेरी समझ के परे है, या वो जो फट्ट से अपने पसंदीदा आर्टिस्ट, उनकी प्रतिभाओं और कमियों और अपने नज़रिए का व्याख्यान शुरू कर देते हैं I मामी जी ने आर्ट गैलरी देखने के न्यौते पे इनमें से कोई भी प्रतिक्रिया नहीं की I मैं समझ गई , ये देखने के बाद करेंगी, इसलिए दिखाना ज़रूरी है I खुद की बात करूँ तो कॉलेज जाने तक आर्ट गैलरी क्या होती है, इसका कोई अंदाजा ही नहीं था, मक़बूल फिदा हुसैन का नाम भी माधुरी दीक्षित के बहाने सुना था I जितनी बार दिल्ली गए, उतनी बार रिश्तेदारों के घर खाना खाने और शादियों में नए कपड़े पहनने के इलावा कुछ किया ही नहीं I दिल्ली में नेशनल गैलरी ऑफ मॉडर्न आर्ट नाम की भी कोई चीज़ है, खबर ही नहीं थी I जब पहली बार वास्ता हुआ, तो आँखों और दिमाग में कुछ हलचल हुई तो ज़रूर, पर जैसे ही जिज्ञासा को तेज़ करने की कोशिश करी, सुई अनेक विधियों और घरानों की समय सारणी में ही अटक कर रह गई I करते करते बात यहाँ तक पहुंची कि दूसरों को ले जाने की हिम्मत आ ही गई I गोया, अब तो फ्रेंच और डच नाम भी जुबां पर आसानी से बैठ ही जाते हैं I

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​एक शाम, बर्नी के नाम ​

'शाम चार बजे से मजमा है', मेरे हाउसमेट रेने ने मुझे बताया I तभी जॉर्ज , मेरे दूसरे हाउसमेट ने कहा 'हाँ, है तो चार बजे से पर अगर पास से देखना और सुनना है तो थोड़ा पहले ही जाना पड़ेगा'I शनिवार की उबासी भरी दोपहर में अचानक से उत्साह आ गया I रेने और जॉर्ज दोनों ही डेमोक्रैट पार्टी के प्रेसिडेंट प्रत्याशी बर्नी सैंडर्स के बारे में बात कर रहे थे I मुझे भी शुक्रवार रात को दोस्तों के साथ गप मारने के दौरान पता चला था कि बर्नी सैंडर्स रविवार को न्यू हेवन, जिस शहर में मैं रहती हूँ, आने वाले हैं और उनकी रैली का आयोजन होने वाला है I मंगलवार को कनेक्टिकट, जिस प्रान्त में न्यू हेवन शहर है, वहाँ डेमोक्रैट पार्टी के प्राइमरी चुनाव होने वाले हैं, यानि वो राउंड जिसमे एक पार्टी अपने ही उम्मीदवारों के बीच चुनाव करती है ताकि ये तय हो सके कि प्रेसिडेंट के चुनाव के लिए दूसरी पार्टी के प्रत्याशी के विपक्ष में कौन सा उम्मीदवार खड़ा होगा/ खड़ी होगी? रिप्लबीकन पार्टी का उम्मीदवार तो तय हो ही चुका है - डॉनल्ड ट्रम्प I अब डेमोक्रैट पार्टी को हिलरी क्लिंटन और बर्नी सैंडर्स के बीच चुनाव करना है I और उसमें एक पड़ाव है कनेक्टिकट I इसी सम्बन्ध में बर्नी सैंडर्स न्यू हेवन आने वाले थे, अपने लिए प्राइमरी चुनाव में वोट मांगने I अब यहाँ तक वो पहुँच ही रहे थे तो मैंने भी तय कर लिया की जायज़ा तो लेना ही चाहिए I
रविवार की खिलखिलाती धूप ने काम आसान कर दिया , घर बैठने का मन वैसे भी नहीं कर रहा था I सुबह के कार्यकलापों की क्रिया चल ही रही थी की रेने ने याद दिलाया - 'आर यू  गोइंग टू फील द बर्न?' इसी फ्रेज से बर्नी सैंडर्स का कैम्पेन चला और बढ़ा है, 'फील द बर्न'I मैंने मुस्कुरा कर हाँ कहाँ, वैसे भी खिड़की से धूप छन कर कमरे में खेल ही रही थी I 'पर बर्नी तो सात बजे के पहले नहीं आएगा , और ठीक ठाक जगह पर खड़े होने के लिए साढ़े तीन बजे तक तो घर से निकलना पड़ेगा ही', रेने ने फिर टोका I मैंने ऊँगली पर घंटे गिने , रविवार की छुट्टी के चार घंटे बर्नी के नाम? तो काम और आराम कब होगा? फिर एक और बार सोचा, हाथ में किताब लेकर जा सकती हूँ, पढूं या न पढूं, आश्वासन तो रहेगा ही I काम निपटा कर तीन दोस्तों के साथ चल पड़ी पर उनको ये नहीं बताया कि रियल एक्शन सात बजे से है, क्या पता वो नदारद हो जाएँ? शहर के डाउन टाउन इलाके में फैला हुआ पार्क है, वहीँ पर रैली का आयोजन था I पहुंचे तो पता चला कि दो बजे से ही लोग लाइन लगा कर खड़े हुए हैं, काफी लम्बी कतार पार्क का आधे से ज़्यादा चक्कर काट ही चुकी थी I संयम का फल मिला ही और सवा चार बजे तक बर्नी सैंडर्स जिस मंच से बोलने वाले थे, उसके काफी करीब जा कर मैंने भी जगह जमा ली I किताब खोली और धूप की तरफ पीठ कर के बैठ गई I

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